किशोर भट्ट
- कर्ज प्रबंधन को लेकर उत्तराखंड का प्रदर्शन देश में सबसे बेहतर, अपनी एसजीडीपी का 25 फीसदी तक ही लेता है कर्ज, पड़ोसी राज्यों से बेहतर स्थिति, राजकोषीय घाटा प्रबंधित करने में देश के अव्वल राज्यों में शामिल, फिर भी क्यों फैलाया जाता है डर
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने बीते सोमवार को गैरसेंण में राज्य का बजट पेश किया। पिछले बजट के मुकाबले इसमें दस फीसद की बढ़ोतरी करते हुए 1 लाख 11 हजार करोड़ रूपए का राज्य गठन के बाद अब तक सबसे बड़ा बजट पेश किया गया। हालांकि, चुनावी साल होने के चलते उम्मीद जताई जा रही थी कि कई लोक लुभावन योजनाएं पेश की जाएंगी जिसके चलते बजट का आकार ज्यादा बढ़ सकता है लेकिन राज्य की आर्थिक स्थिति को देखते हुए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने चुनावी साल लोकलुभावन घोषणाओं के लिए करोड़ों रूपए के प्रावधान से बचने की राह चुनी।
राज्य की प्रगति हाल के सालों में राष्ट्रीय स्तर पर औसत से बेहतर रही, प्रति व्यक्ति आय के क्षेत्र से लेकर जीडीपी तक में राज्य के प्रदर्शन ने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी छवि सुधारी, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के वित्तीय प्रबंधन और नीतिगत सुधारों की वजह से हाल के सालों में राज्य ने कई मोर्चों पर बेहतर प्रदर्शन किया है। हालांकि, राज्य के बजट पेश होने के साथ ही सालाना ‘कर्ज में डूबता उत्तराखंड’ शीर्षक से लेख, वीडियो बनने का सिलसिला भी शुरू हो गया है। राज्य पर बढ़ता कर्ज चिंता का विषय है या नहीं, इससे इतर कर्ज के आंकड़ों को भयावह तरीके से पेश कर राज्य की ऐसी तस्वीर बनाई जा रही है जिससे लगे कि राज्य की गाड़ी कर्ज पर ही चल रही है। पहाड़ी राज्य होने के चलते राज्य के पास राजस्व अर्जित करने के सीमित संसाधन हैं, उस पर राज्य में की कुल आय का बड़ा हिस्सा वेतन पेंशन पर खर्च हो रहा है।
हर साल बजट पेश होने के बाद से लेकर समय समय पर राज्य पर बढ़ते कर्ज की खबरों को खूब मिर्च मसाला लगाकर पेश की जाती है। राज्य अपनी विकास योजनाओं, जरूरी व्यय जुटाने के लिए ऋण लेने का अधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 293 के तहत मिला हुआ है। राज्य कितना कर्ज ले सकता है इसका निर्धारण राज्य की जीडीपी से तय होता है। यह ढांचा राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन अधिनियम 2003 के सिद्धांतों पर तय होता है। देश का हर राज्य को विकास योजनाओं के क्रियान्वयन, जन कल्याणकारी योजनाओं, ढांचागत सुविधाओं की अवस्थापना के लिए कर्ज लेना ही पड़ता है। वित्त मंत्रालय, वित्त आयोग और भारतीय रिजर्व बैंक राज्य के प्रदर्शन, राज्य की विकास गति, जीडीपी को देखते हुए ऋण की सीमा तय करता है जिससे कोई भी राज्य तय सीमा से ज्यादा कर्ज लेकर असुंतलन न पैदा करे। फिलहाल कुल जीएसडीपी के 32 फीसदी से कम कर्ज को सुरक्षित स्थिति माना जाता है जबकि इससे उपर कर्ज राज्य के लिए गंभीर स्थिति वाला माना जाता है। जैसे कि जम्मू कश्मीर ने अपनी जीएसडीपी के 51 फीसदी तक कर्ज ले चुका है, जबकि आपके अखबार के पहले पन्ने पर हर दिन दिखने वाले पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान के नेतृत्व में पंजाब सरकार अपने जीएसडीपी का तकरीबन 44 फीसदी कर्ज ले कर राज्य को संकट में डाल चुके हैं। बात बात पर उत्तराखंड की तुलना कर राज्य को कमजोर बताने के लिए जिस हिमाचल राज्य का उदाहरण दिया जाता है वह अपने राज्य जीडीपी का कुल 40 फीसदी से अधिक कर्ज ले चुका है। फिलहाल देश में एसजीडीपी के मुकाबले ज्यादा कर्ज लेने वाले राज्यों में उत्तराखंड शामिल नहीं है। कुशल वित्तीय प्रबंधन के चलते राज्य फिलहाल राज्य जीडीपी का 25 फीसदी कर्ज के पास है जो कि किसी राज्य के लिए सबसे आदर्श माना जाता है।
उत्तराखंड में प्रति व्यक्ति आय 2 लाख 73 हजार रूपए हैं जो राष्ट्रीय औसत से काफी ज्यादा है तो साथ ही राज्य की जीडीपी भी 4 लाख करोड़ रूपए पार पहुंचने वाली है। राज्य की जीएसडीपी दर 8 फीसद से भी अधिक है जो कि देश के कई राज्यों से बेहतर स्थिति है। वहीं राज्य का राजकोषीय घाटा भी 3 फीसदी से कम रहता है जो इसे देश के सबसे आदर्श राज्यों में शामिल करता है।
राज्य में सीमित संसाधनों के बावजूद नीतिगत सुधारों के चलते राजस्व में बढ़ोत्तरी भी देखी गई है। हमेशा तय लक्ष्य का आधा राजस्व देने वाला खनन क्षेत्र आज तय लक्ष्य से अधिक का राजस्व देने वाला क्षेत्र बन गया है, आबकारी का प्रदर्शन भी राजस्व में सुधरा है। इसके अलावा राज्य में हाल के सालों में पर्यटन के क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर खुले हैं, होमस्टे, होटल निर्माण में जबरदस्त उछाल आया है।
कर्ज लेना किसी भी राज्य के लिए सामान्य है, हम इस बात को क्यों स्वीकार नहीं करते खासकर तब जब यह कर्ज जनकल्याणकारी नीतियों से लेकर ढांचागत सुविधाओं के निर्माण के लिए लिया जा रहा हो। कर्ज लेना सामान्य प्रक्रिया है, और राज्य के कर्ज लेने की क्षमता अपने प्रदर्शन के चलते बेहतर हुई है। यह भी सवाल उठ रहा है कि बजट का एक हिस्सा कर्ज के ब्याज अदायगी के रूप में जाएगा, यह तो होता ही है अगर योजनाओं के लिए कर्ज लिया गया हो तो उसका ब्याज तो चुकाना ही होगा ताकी राज्य का सिविल स्कोर बेहतर बना रहे।
हां और इतना भी लोगों को मत डराइए कि वह राज्य का कर्ज खुद का कर्ज मानकर कल से मांग करने लगें कि सरकारी नौकरियां देना बंद करो, पेंशन देना बंद करो, जनकल्याणकारी योजनाओं पर खर्च करना बंद करो, गरीब मरीजों को निशुल्क उपचार देना बंद करो, राज्य आंदोलनकारियों का सम्मान बंद करो, युवाओं को निशुल्क प्रशिक्षण देना बंद करो, महिलाओं के सशक्तिकरण वाली योजना बंद करो, कृषि बागवानी को प्रोत्साहित करने वाली योजनाएं बंद करो।
राज्य के कर्ज को एक सामान्य प्रक्रिया मानिए और इस बात को स्वीकार कीजिए कि देश में दूसरे भी ऐसे राज्य हैं जो कर्ज लेने के मामले में सबसे खराब राज्यों की श्रेणी में शामिल हो चुके हैं। राज्य सरकारों को कर्ज लेना ही होता है, हां विकास के मामले में बेहतर प्रदर्शन इस कर्ज को न्यायोचित ठहराता है। और इस मामले में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की तारीफ बनती है कि विकास के मामले में उनके नेतृत्व में कुशल प्रदर्शन किया है।